Friday, 24 February 2012

सहेलियां


ये है सच्ची कहानी , इसे मजाक न समझना !
दो सहेली ढूंढ रही हैं ,अपना अपना सजना !!

उन दोनों में से सीता लिखती थी कविता ,
कविता का दर्द देख , गीता को हुई चिंता !!

पंक्तियाँ पढ़ ...गीता हो गयी परेशान !
कहीं इसे भी पसंद तो  नहीं है  ... मेरी ही जान !!

अपने डर को छुपाते हुए गीता ने पुछा ,
कोन है ? कोन है ? मुझे तो कोई भी न सूझा !!

"मुझे भी एक लड़का पसंद है " गीता बोली ,
मजाक समझ सीता बोली - " मुझे न दे तू गोली "  !!

जब चली उनकी वार्तालाप कुछ और देर !
सीता को समझ आया, गीता न रही थी उसे छेड !!

गीता ने तो  उसे सच्ची कथा सुनाई ,
गलत तो सीता थी , जो दर्द समझ न पायी !!

दोनों ने एक दूजे की पसंद का नाम पुछा ,
मन में गीता सोचे --" काश ...तेरा हो कोई दूजा "

शर्माती रही दोनों , कोई नाम न बताये !
धड़कने हुई तेज , सूझे न कोई उपाय  !!

दोनों सहेलियों ने फिर रास्ता निकाला ,
अपनी पसंद के नाम का फिर पहला अक्षर लिख डाला !!

साथ ही दोनों ने रक्खी एक शर्त ,
जानना है नाम तो  पहले करो दिमाग खर्च !!

एक दुसरे की पसंद के नाम का मरना है तुक्का ,
अगर नाम हुआ गलत , तो फिर ख़तम यहीं पे मुद्दा !!

दोनों सहेलियों  की दोस्ती थी गहरी  !
तुक्के भी लगे सही , खुली  राजो  की तिजोरी  !!

सुस्पेंसे तोडती सीता ने जैसे ही कहा  - 'अ'
मिली राहत गीता को , बोली --" मेरा वाला तो 'त' "

दिल को हल्का किया , दोनों ने अपनी गाथा सुनाई  !
करे अब  गहरा अध्यन की कैसे जाये एक दूजे की ग्रहस्ती बस्वायी  !!

दोस्तों ये कहानी नही सीता और गीता की ,
झाको अपने मन में तो पाओ आपनी ही किसी सहेली की !!







No comments:

Post a Comment